बुधवार, 1 सितंबर 2010

कृं कृष्णाय नम:

अंधे की आँख गीता ,बुडे -बचे -जवान का सहारा गीता , हर इन्सान की रक्षक गीता ,

१ सितंबर को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन पर सभी जगह तैयारी चरम पर है। यह दिन भगवान का जन्मदिन मनाने का है। भगवान श्रीकृष्ण आनंद और सुख के देवता हैं। उनकी भक्ति और उपासना सुख, ऐश्वर्य, धन, सम्मान, प्रतिष्ठा और मोक्ष देने वाली मानी गई है। भाद्रपद कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण की प्रसन्नता पाने के लिए खास दिन है।
यहां बताया जा रहा है भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का ऐसा सरल मंत्र जिसका श्रीकृष्ण जन्माष्टमी ही नहीं बल्कि नियमित जप या उच्चारण करने पर जीवन में आ रही कष्ट और बाधाओं से छुटकारा मिलता है। कृष्ण का यह मूल मंत्र व्यक्ति के हर मनोरथ पूरे करता है और सुख दे देता है।


कृं कृष्णाय नम:


सभी सुख देने वाले कृष्ण के इस मूलमंत्र का जप श्रीकृष्ण जन्माष्टमी या हर रोज सुबह स्नान कर एक सौ आठ बार करें। इस छोटे मंत्र के प्रभाव से जीवन में बड़े और सुखद बदलाव आएंगे।

दैनिक भास्कर



 
सोमवार,19 जुलाई, 2010 को 08:35 तक के समाचार

भागवत: 20- सभी वेदों का सार है भागवत

Source: पं. विजयशंकर मेहता   |   Last Updated 8:35 PM [IST](19/07/2010)
 
 
 
 
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ऋग्वेदी शौनक ने पूछा- सूतजी बताएं शुकदेवजी ने परीक्षित को, गोकर्ण ने धुंधकारी को, सनकादि ने नारद को कथा किस-किस समय सुनाई ? समयकाल बताएं।
सूतजी बोले- भगवान के स्वधामगमन के बाद कलयुग के 30 वर्ष से कुछ अधिक बीतने पर भ्राद्रपद शुक्ल नवमी को शुकदेवजी ने कथा आरंभ की थी, परीक्षित के लिए। राजा परीक्षित के सुनने के बाद कलयुग के 200 वर्ष बीत जाने के बाद आषाढ़ शुक्ला नवमी से गोकर्ण ने धुंधुकारी को भागवत सुनाई थी। फिर कलयुग के 30 वर्ष और बीतने पर कार्तिक शुक्ल नवमी से सनकादि ने कथा आरंभ की थी।
सूतजी ने जो कथा शौनकादि को सुनाई वह हम सुन रहे हैं व पढ़ रहे हैं। जब शुकदेवजी परीक्षित को सुना रहे थे तब सूतजी वहां बैठे थे तथा कथा सुन रहे थे।
भागवत के विषय में प्रसिद्ध है कि यह वेद उपनिषदों के मंथन से निकला सार रूप ऐसा नवनीत है जो कि वेद और उपनिषद से भी अधिक उपयोगी है। यह भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का पोषक तत्व है। इसकी कथा से न केवल जीवन का उद्धार होता है  अपितु इससे मोक्ष भी प्राप्त होता है। जो कोई भी विधिपूर्वक इस कथा को श्रद्धा से श्रवण करते हैं उन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार फलों की प्राप्ति होती है।
कलयुग में तो श्रीमद्भागवत महापुराण का बड़ा महत्व माना गया है। इसी के साथ ग्रंथकार ने भागवत का महात्म्य का समापन किया है।
क्रमश:...
 
 
 
 
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गुरुवार, 29 जुलाई 2010

ऋषि

हिन्दू धर्म में विष्णु पुराण के अनुसार, कृतक त्रैलोक्य -- भूः , भुवः और स्वः – ये तीनों लोक मिलकर कृतक त्रैलोक्य कहलाते हैं।
सप्तर्षि मण्डल
शनि मण्डल से एक लाख योजन ऊपर सप्तर्षि मण्डल है।
सप्तर्षि मंडल
फाल्गुन-चैत महिने से श्रावण-भाद्र महिने तक उत्तर आकाश में सात तारों का समूह दिखाई पड़ता है। इसमें से चार तारें चौकोर तथा तीन तिरछी लाइन में रहते हैं। इन तारों को काल्पनिक रेखाओं से मिलाने पर एक प्रश्न चिन्ह की तरह दिखाई पड़ते हैं। इन्हीं सात तारों को सप्तर्षि मंडल कहते हैं। इन तारों का नाम प्राचीन काल के सात ऋषियों के नाम पर रखा गया है। ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है। इसे अंग्रेजी में ग्रेट/ बिग बियर या उर्सा मेजर कहते हैं। यह कुछ पतंग की तरह लगते हैं जो कि आकाश में डोर के साथ उड़ रही हो। यदि आगे के दो तारों को जोड़ने वाली लाईन को सीधे उत्तर दिशा में बढ़ायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचती है।

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

BRAHMINS - Brahmin Community - A Wise Clan

BRAHMINS - Brahmin Community - A Wise Clan

जगत गुरु ब्राह्मिनो को प्रणाम कलयुग में शूद्रों को प्रणाम ,नारियों और देवियों को प्रणाम

बुधवार, 17 मार्च 2010

कृष्ण की आज्ञा

गिरिजेश राव जी ने प्रश्न किया हे की मेने अडल्ट टेग क्यों दिया हे?// इस का उतर ---मेरी तो इछा नही थी परन्तु bhgwan कृष्ण की आज्ञा के विपरीत जाने की हिमत गीता नही कर सकी भगवान ने कहा हे ,तुझे यह गीता रूप रहस्य -म्ये उपदेश किसी भी काल में तप - रहित भगती - रहित और न सुनने की इछा वालों खास कर unse जो मुझ में दोष दृष्टि रख ते हें ऐसे मनुषों से तो कभी नही कहना

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

मुर्खता पूर्ण ब्यान

ND
सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने गणेशोत्सव के दौरान एक अनूठा तोहफा दिया है। लताजी की आवाज में शीघ्र ही 'हनुमान चालीसा' बाजार में आ रहा है। यह पहला अवसर है जब किसी महिला ने हनुमान चालीसा गाया है।

लताजी ने यूँ तो भक्ति संगीत के कई गीत गाए हैं और श्रीराम स्तुति को उनसे बेहतर आज तक कोई भी बेहतर ढंग से पेश नहीं कर पाया है। हनुमान चालीसा की उनकी यह नई पेशकश निश्चित रूप से 'बजरंग भक्तों' के लिए एक नई सौगात साबित होगी।

लता ने कहा कि इस समय हमारा देश बेहद कठिन समय से गुजर रहा है और हनुमानजी संकटमोचन के नाम से जाने जाते हैं। लताजी ने कहा कि मैंने अपने 60 साल के करियर में हनुमानजी की प्रशंसा में कोई गीत नहीं गाया, लेकिन अब मैं हनुमान चालीसा को आवाज दे रही हूँ। उनका आशीर्वाद लेने का यह सही समय है।

लता मंगेशकर को इस वक्त मुंबईClick here to see more news from this city स्थित अपने घर के नीचे धूमधाम से गणेशोत्सव मनाते देखा जा सकता है। यह भी खबर है कि उन्होंने अपनी आवाज में हनुमान चालीसा के पाठ की जो रिकॉर्डिंग की थी, वह कैसेट की शक्ल ले चुकी है।

आम धारणा है कि हनुमानजी ब्रह्मचारी रहे, लिहाजा महिलाएँ न तो हनुमान चालीसा का पाठ करती हैं और न ही उनके मंदिरों में शीश झुकाने जाती हैं, लेकिन बदलते वक्त ने इस धारणा को भी तोड़ दिया। आज हनुमान मंदिरों में बच्चों, पुरुषों के साथ-साथ युवतियाँ और महिलाएँ भी अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए बड़ी संख्या में पहुँचती हैं।

विश्व प्रसिद्ध संत मुरारी बापू भी अपनी रामकथा के प्रवचनों में साफ तौर पर कहते हैं कि हनुमाजी की आराधना करना महिलाओं के लिए वर्जित नहीं है। 
                                   मुर्खता पूर्ण ब्यान 
                                    बाल ब्रह्मचारी हनुमान के द्वार पर नारी का क्या काम 
                                               बापू इतने स्वार्थी ना बनो 
                                                       दिल  नही मानता तो 
                                                            तुम भी नारी संग नाच लो 
                                                              

रविवार, 27 दिसंबर 2009

गीता

मनकी शान्ति गीता ,मन की चंचलता गीता ,मन की हलचल गीता ,मन को काबू करती गीता ,मनकी तृप्ति गीता ,सभी की मार्गदर्शक गीता ,तेरी मेरी गीता ,अंधे की आँख गीता ,बुडे -बचे -जवान का सहारा गीता , हर इन्सान की रक्षक गीता ,चिन्तन -मनन का साधन गीत
गीता उपदेश जीवन की धारा है। चूंकि गीता में जीवन की सच्चाई छिपी है और इसमें जीवन में आने वाली दुश्वारियों के कारण व निवारण दोनों को ही विस्तार से समझाया गया है। इसलिए गीता के उपदेश विश्व भर में प्रसिद्ध है और हर वर्ग को प्रभावित करते हैं।







उन्होंने उदाहरण देकर समझाते हुए कहा कि गीता डाक्टर की भांति है। बस फर्क इतना ही है कि डाक्टर शरीर के रोगों का इलाज करता है जबकि गीता मन के रोगों का इलाज करती है और उन्हें दूर करने का मार्ग दिखाती है। जिस प्रकार डाक्टर रोगी को रोग के निवारण के साथ-साथ उसके कारण भी बताता है। ठीक उसी प्रकार से गीता का अगर गहनता से अध्ययन किया जाए तो इससे मन के रोगों का कारण और निवारण दोनों का पता चल जाता है।






गीता मन के रोगों को दूर करने का एक सशक्त माध्यम है। गीता ज्ञान से मानव जीवन में मोह को भी आसानी से दूर किया जा सकता है। मोह जीवन लीला को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। जीवन में दुखों का सबसे बडा कारण मोह ही है। जीवन को अगर सफल बनाना है और मोह से मुक्ति पानी है तो गीता की शरण में जाना पडेगा। गीता से ज्ञान पाकर मानव मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।






गीता का ज्ञान मनुष्य को उसकी आत्मा के अमर होने के विषय में बोध करवा कर अपने कर्तव्य कर्म को पूर्ण निष्ठा से करने को प्रेरित करता है। भगवान ने मनुष्य को देह केवल भोग के लिए प्रदान नहीं की है अपितु हमें इसका उपयोग मोक्ष प्राप्ति के लिए करना चाहिए। इसके लिए हमें भजन, सत्संग, समाज सेवा व जन कल्याण के कार्य करने चाहिए।






उन्होंने कहा कि साधु व नदी कभी एक स्थान पर नहीं रुकते और निरंतर आगे बढते हुए विभिन्न स्थानों पर जन-जन के हृदयों में अपने ज्ञान व भक्ति के प्रभाव से उन्हें लाभान्वित व आनंदित करते हैं। प्रत्येक मानव को पूरी श्रद्धा व निष्ठा से परोपकार के लिए तैयार रहना चाहिए और अपने ज्ञान से जगत को प्रकाशमान करने का प्रयास करते रहना चाहिए, असल में यही मानव धर्म है।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

मनकी शान्ति गीता ,मन की चंचलता गीता ,मन की हलचल गीता ,मन को काबू करती गीता ,मनकी तृप्ति गीता ,सभी की मार्गदर्शक गीता ,तेरी मेरी गीता ,अंधे की आँख गीता ,बुडे -बचे -जवान का सहारा गीता , हर इन्सान की रक्षक गीता ,चिन्तन -मनन का साधन गीता

हादसों और त्रासदियों से गुजरते हुए अनुभवों से हम यह जो पहले दिन का सूर्य देख रहे हैं, वह पहले जैसा नहीं है। कुछ नया कह रहा है, कुछ नया पूछ रहा है। सियासतगर्दी और दहशतगर्दी के वार से लहूलुहान जख्म लेकर हमने जो जश्नों से हट कर प्रश्नों से मुकाबला करने की बातें तय की थीं, साल का प्रारंभ उन्हीं सवालों को लेकर खड़ा है। लेकिन नागरिकों के कब्र पर नेता अपने जन्मोत्सव की तैयारियों में मशगूल हैं और हम नया साल मुबारक का मर्सिया पढ़ने में...मशगूल                             सुना देर रात कि लोग नए साल के आगमन का जश्न मनाने सड़कों पर निकल आए हैं... साफ दिखा सत्ता अलमबरदारों के पाप का संताप कम करने के लिए आम आदमी 'जश्न’ की घातक नशीली दवा का लती हो चुका है। पूरी तरह बेहोश... होश दुखदायी असलियत की पीड़ा जो देता है।
कभी नशे में आने, कभी उससे पार पाने की कोशिशों और चिल्लपों से दूर एकांत की तलाश में यूं ही अचानक देर रात गोमती नदी के किनारे मायावती की मूर्ति के पायताने एकांत में गुमसुम बैठे लखनऊ से मुलाकात हो गई। थका हारा निढाल सा लखनऊ का सूक्ष्म शरीर गोमती के इर्द गिर्द बिखरे निर्मम पत्थरों से तय हो रही विकास यात्रा का सच पढ़ने की शायद कोशिश में था। उसी लखनऊ की आत्मा से रात की मुलाकात एक अलग विचार-लोक में ले जाती है। सुख और गौरव के संस्मरणों में भोगे जा रहे वर्तमान की पीड़ा के अजीबोगरीब व्यथा-संसार में। कब सुबह हो गई! कब नया साल आ गया! कब लखनऊ का सूक्ष्म शरीर स्थूल में जा मिला! कब सारा दृश्य एक बार फिर भाव से भौतिक हो गया, पता ही नहीं चला।
बात करने को राजी ही नहीं थे। कई सारे सवाल एक साथ ही पूछ डाले। नए साल का जश्न मनाने वाली भीड़ का तुम हिस्सा तो नहीं? कोई नेतातो नहीं? कोई अपराधी या अधिकारी तो नहीं? फिर रात में गोमती बंधे पर क्यों फिर रहे? ताबड़तोड़ कई सवाल। सूक्ष्म शरीर से स्थूल सवालों की बौछार? इस पर लखनऊ ढीले पड़े। आंखों के भाव बदले। पितृ-भाव से परखा फिर बड़े स्नेह से बगल में बिठाया। इस बार मेरे बिना पूछे ही बोल पड़े, जैसे स्वगत। ...दूर वह श्मशान निहार रहा था... कैसे कैसे श्मशान का विस्तार पूरे शहर पर पसर गया... चौराहों-चौबारों पर लाशें सजने लगीं... कैसा फर्क आया कि पुरखों का सम्मान और अनुसरण करने के बजाय उनकी लाशों की प्रतिकृतियों से हम खूबसूरत पृथ्वी को ढांकने लगे... समाधियों और स्मारक के विस्तार को हम सामाजिक विकास का मानक मानने लगे... जब मुरदे हमारे प्रतीक चिन्ह बन जाएंगे तो जीवन कहां रह जाएगा... इसीलिए तो हमारे प्राण संकट में फंस गए... मैं खुद इसका भुक्तभोगी हूं।लखनऊ के भाव तीखे होते चले गए। कहने लगे। ...समाज का उत्थान मकबरों से शुरू होता देखा है कभी? जीवन के अंत का प्रतीक चिन्ह समाज के जिंदा होने का प्रतीक बन जाए तो क्या होगा? इसीलिए तो भीड़ इतनी निस्तेज दिखती है... कभी सोचा है? लखनऊ खुद बोल पड़ते हैं... सोचा होता तो न इस देश की दुर्दशा हुई होती न मेरी... अंधेरा और स्याह दिखने लगा था। वयोवृद्ध लखनऊ की सांसें तेज होने लगी थीं। भावुकता के ज्वार फूटने लगे थे। वे बुदबुदा रहे थे... शायद हम सबसे ही कह रहे थे...
जब धरा पर धांधली करने लगे पागल अंधेरा/और अमावस धौंस देकर चाट ले सारा सवेरा/तब तुम्हारा हार कर यूं बैठ जाना बुजदिली है पाप है/आज की इन पीढि.यों को बस यही संताप है/अब भी समय है आग को अपनी जलाओ/बाट मत देखो सुबह की प्राण का दीपक जलाओ/मत करो परवाह कोई क्या कहेगा/इस तरह तो वक्त का दुश्मन सदा निर्भय रहेगा/सब्र का यह बांध तुमने पूछ कर किससे बनाया/कौन है जिसने तुम्हें इतना सहन करना सिखाया/तोड़ दो यह बांध बहने दो नदी को/दांव पर खुद को लगा कर धन्य कर दो इस सदी को/मैं समय पर कह रहा हूं और अब क्या शेष है/तुम निरंतर बुझ रहे हो बस इसी का क्लेश है/जो दिया बुझ कर पड़ा हो वह भला किस काम का/यह समय बिल्कुल नहीं है ज्योति के आराम का/आज यदि तुमने अंधेरे से लड़ाई छोड़ दी/तो समझ लो रौशनी की चूड़ियां घर में बिठा कर तोड़ दी...
                                          लखनऊ की आंखों के कोर भींगने लगे थे। मैं उसमें डूबता चला गया। वे कब चले गए और मैं कब ठहर गया, पता ही नहीं चला। तंद्रा अब तक टूटी नहीं है। लखनऊ की आत्मा के स्वर अब भी गूंज रहे हैं। मन तिक्त हो उठा है। कैसे कहें नया साल मुबारक...!

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

जबलपुर हाईकोर्ट के आदेश के पालन में घमापुर-शीतलामाई मार्ग के अतिक्रमणों पर युद्धस्तरीय कार्रवाई जारी है। मंदिर के ट्रस्टी डॉ. रमाकांत रावत का कहना है कि यदि ठीक से नपाई की जाती तो ये स्थिति कतई न बनती। ऐसा इसलिए क्योंकि मंदिर बकायदे राजपत्र में प्रकाशित है। सरकारी रिकॉर्ड में इसका अस्तित्व 1944 से मिलता है लेकिन दरअसल, ये मंदिर अति प्राचीन है। यह पुरातात्विक महत्व का एशिया का संभवतः एकमात्र विशालतम शीतलामाई मंदिर है। इसके नाम एक वार्ड जाना जाता है।
सौ वर्षों में पहली बार मालवा अंचल में 'सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय' के उद्देश्य से हो रहे कोटिरूद्र महायज्ञ के लिए साँवेर रोड धरमपुरी स्थित विश्वनाथधाम सज-सँवरकर तैयार है। यहाँ 6 से 31 दिसंबर तक हथियाराम मठ बनारस के वरिष्ठ महामंडलेश्वर स्वामी बालकृष्ण यतिजी के सान्निध्य में देशभर के 330 चुनिंदा विद्वान आचार्य 3 करोड़ रूद्रपाठ के साथ भगवान काशी विश्वनाथ का रूद्राभिषेक करेंगे।




अनुष्ठान के लिए 18 एकड़ भूमि पर यज्ञशाला व प्रवचन पांडाल तथा 21 सौ फुट वर्गाकार व 60 फुट चौड़ा परिक्रमा मार्ग बनाया गया है।




महायज्ञ का शुभारंभ 6 दिसंबर को सुबह 9.15 बजे होगा। यह दो चरणों में होगा। 6 से 31 दिसंबर तक प्रतिदिन सुबह 9 से दोपहर 1 बजे व दोपहर 2 से शाम 6 बजे तक होने वाले अभिषेकात्मक यज्ञ में एक प्रधान यजमान और 11 यजमान काशी विश्वनाथ का रूद्राभिषेक करेंगे। इस दौरान प्रतिदिन गौदुग्ध की अखंडधारा से मुख्य यजमान द्वारा दुग्धाभिषेक भी किया जाएगा।



यह अनुष्ठान बनारस के राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त यज्ञाचार्य पं.लक्ष्मीकांत दीक्षित के निर्देशन में होगा। इसके बाद 1 से 11 जनवरी तक हवनात्मक यज्ञ के तहत 150 यजमान 25 कुण्डों पर विद्वान ब्राह्मणों के निर्देशन में कोटिरूद्र महायज्ञ संपन्न करेंगे। इसकी शुरुआत 1 जनवरी को ऐतिहासिक शोभायात्रा के साथ होगी। 1 जनवरी से वृंदावन के प्रख्यात रासाचार्य पद्मश्री स्वामी रामस्वरूपजी शर्मा के निर्देशन में रासलीला और 2 जनवरी से राजकोट की प्रख्यात भागवत मर्मज्ञ मीराबेन के सान्निध्य में भागवत कथा होगी। जिसका आयोजन दोपहर 2 बजे से होगा।
                                                         बापरे  बाप जरा विचार तो करलें क्या यह  महा यग्य अश्व मेघ यग्य से भी बड़ा हें |जब अश्वमेघ यग्य सम्पूर्ण नही हो सका तो इस की क्या गारंटी है?
क्या विद्वानों को और कोई साधन सभी के हित के लिए नही सोचना चाहिए था?

संत तरुण सागर जी महाराज

प्रख्यात जैन संत तरूण सागर ने कहा है कि धर्मग्रंथ गीता किसी एक धर्म की जागीर नहीं है और न ही उस पर हिंदुओं का एकाधिकार है। मुनिश्री तरूण सागर ने पत्रकारों से बातचीत में कल रायपुर में यह उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि गीता में कहीं भी हिंदू का उल्लेख नहीं है। गीता पर सबका अधिकार है।




उन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्द को जरूरी बताते हुए कहा कि हिंदू और मुसलमान देश की दो आँखें हैं। भारत में सांप्रदायिकता मुल्क के हिसाब से नहीं है। रमजान लिखते हैं तो राम से शुरुआत करते हैं दिवाली लिखते हैं अली से खत्म करते हैं।



उन्होंने कहा सत्ता और भ्रष्टाचार का करीबी रिश्ता है। सत्ता और राजनीति को काजल की कोठरी करार देते हुए कहा कि इस पर अगर कोई घुसे और बेदाग निकल जाए यह संभव नहीं है, लेकिन जो बेदाग निकलते हैं उन्हें प्रणाम करना चाहिए। राजनीति में जो ईमानदार लोग भी हैं उनमें साहस नहीं है। ईमानदारी के साथ-साथ साहसी भी होना जरूरी है, बुराइयों के खिलाफ लड़ने का साहस होना चाहिए।






जीवन जीने के दो तरीके बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि पहला जो चल रहा है उसके साथ चलना। दूसरा जो हो रहा है उसके विपरीत चलना। प्रवाह के विरोध के लिए ऊर्जा चाहिए। गंगोत्री की गंगासागर से यात्रा मुर्दा भी कर लेता है, लेकिन गंगासागर से गंगोत्री की यात्रा करने के लिए साहस चाहिए। प्रवाह के विरुद्ध बहने के लिए साहस जरूरी है। सामाजिक-वैश्विक समस्याओं से निपटने के लिए साहस चाहिए।



जैन सन्त ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि आज देश में गाय धर्मनीति और राजनीति के बीच पीस रही है। जब तक इन्हें इन बँधनों से मुक्त नहीं करेंगे गौरक्षा असंभव है। गौरक्षा को धर्मनीति और राजनीति से निकालकर अर्थनीति से जोड़ना होगा तभी गौरक्षा आंदोलन सफल होगा। उन्होंने एक अन्य प्रश्न के उत्तर में कहा कि जैन धर्म के सिद्धांत दुनिया को सुधारने के लिए उपयोगी है अच्छे हैं, लेकिन उसकी मार्केटिंग नहीं हो पा रही है इसलिए पिछड़ रहा है।



धर्म और राजनीति के संबंध में उन्होंने कहा कि धर्म गुरु है और राजनीति शिष्य। राजनीति अगर गुरु के समक्ष आती है तो यह समस्या खड़ी हो जाती है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के संबंध में पूछे गए सवाल पर संतश्री ने कहा कि वहाँ हजारों लाखों लोगों की आस्था टिकी हुई है इसलिए कानून के दायरे में रहकर मंदिर निर्माण का काम होना चाहिए। धर्म को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म परिवर्तन का नाम है। यह बेचने-खरीदने की चीज नहीं है। धर्म जीने की चीज है प्रदर्शन का नहीं।

सोमवार, 30 नवंबर 2009

संदेश मेरे लिए देखें आप सभी

- श्री भगवान को प्रेम से जगाओ आपका भाग्य जागेगा।


- श्री भगवान को स्नान कराओ तो आपके सब पाप धुल जाएँगे।

- श्री भगवान को चरणामृत प्रेम से पान कराओ आपकी मनोवृत्ति बदल जाएगी।



- श्री भगवान को तिलक लगाओ आपको सर्वत्र सम्मान मिलेगा।

- श्री भगवान के चरणों का तिलक स्वयं भी लगाओ आपका मन शां‍त होगा।

- श्री भगवान को भोग लगाओ आपको संसार के सभी भोग मिलेंगे।



- श्री भगवान का प्रसाद स्वयं भी पाओ, आप निष्‍पाप हो जाओगे।

- श्री भगवान के सम्मुख दीप जलाओ आपका जीवन प्रकाशवान होगा।

- श्री भगवान को धूप लगाओ आपके दुख के बादल स्वत: छट जाएँगे।



- श्री भगवान को पुष्प अर्पित करो आपके जीवन की बगिया महकेगी।

- श्री भगवान का भजन-पाठ करो आपका यश बढ़ेगा।

- श्री भगवान को प्रणाम करो संसार आपके आगे झुकेगा।



- श्री भगवान के आगे घंटनाद करो आपकी दुष्प्रवृत्तियाँ दूर होंगी।

- श्री भगवान के आगे शंखनाद करो आपकी काया निरोगी रहेगी।

- श्री भगवान को प्रेम से शयन कराओ आपको चैन की नींद आएगी।



- श्री भगवान के दर्शन करने नित्य मंदिर जाओ आपके दुख में प्रभु दौड़े चले आएँगे।

- श्री भगवान को अर्पण कर ही वस्तु का उपभोग करो आपको परमानंद मिलेगा।

- श्री भगवान को लाड़-प्यार से खिलाओ संसार आप पर रिझेगा।



- श्री भगवान से ही माँगो जो चाहोगे वो आपको मिलेगा। (अन्य से नहीं)

- श्री भगवान का प्रसाद मान सुख-दुख भोगो आप सदा सुखी रहेंगे।

- श्री भगवान का ध्यान करो प्रभु अंत समय तक आपका ध्यान रखेंगे।

सौजन्य से - श्री रामभक्त हनुमान मंदिर

अधुरा मन्दिर



क्या आपने ऐसा कोई प्राचीन अधूरा मंदिर देखा है जिसकी छत न हो और जिसमें किसी देवता की मूर्ति भी स्थापित न की गई हो। यदि नहीं तो आओ चलते हैं एक ऐसे ही मंदिर में।




इस मंदिर के बारे में कई तरह की किंवदंतियाँ है। जिनमें से दो किंवदंतियाँ ज्यादा प्रचलित है। इस मंदिर की दास्तान जुड़ी हुई है नेमावर के सिद्धनाथ मंदिर से। एक बार की बात है नेमावर के सिद्धेश्वर क्षेत्र में कौरव और पांडवों का रुकना हुआ।



एक शाम कुंती ने देखा की कौरवों ने इस क्षेत्र में एक भव्य मंदिर बनाया है तब उन्होंने पांडवों से कहा कि तुम भी इसी तरह का एक भव्य मंदिर बनाओ जिससे कौरवों के समक्ष हमारी प्रतिष्ठा बनी रहे और तुम्हारे पास इसे बनाने के लिए सिर्फ एक रात ही बची है।



उसी शाम कौरवों ने पांडवों से कहा की हमने इस क्षेत्र में एक मंदिर बनाया है। पांडवों ने कहा कि हमने भी इस क्षेत्र में एक मंदिर बनाया है। कौरवों ने कहा कि हमने तो आपको बनाते हुए देखा नहीं और यदि बनाया भी है तो हम पहले ही बता दे कि हमारा मंदिर पूर्वमुखी है और आपका?





NDपांडवों ने कहा कि हमारा पश्चिममुखी मंदिर है। इस पर कौरवों ने कहा कि ठीक है। तब तो हम कल सवेरे आपका मंदिर देखने चलेंगे।



पांडवों को अब यह चिंता सताने लगी कि आखिर रात भर में मंदिर कैसे बन पाएगा जबकि हमने कौरवों से झूठ कहा था कि हमने भी मंदिर बनाया है। ऐसे में भीम ने कहा कि आप चिंता न करें। भीम ने कुंती को वचन दिया की मैं रात भर में आपके कहे अनुसार मंदिर बना दूँगा।



रात्रि में भीम ने कौरवों के बनाए मंदिर के पास स्थित पहाड़ी पर मंदिर बनाने का कार्य आरंभ किया। लेकिन अर्ध रात्रि से ऊपर बीत जाने पर भी वह मंदिर नहीं बना पाए, तब उक्त मंदिर को अधूरा ही छोड़कर भीम ने जहाँ कौरवों ने मंदिर बनाया था उस उक्त पूर्वाभिमुखी मंदिर को घुमाते हुए पश्चिममुखी कर दिया।



दूसरी कहानी इस तरह की है कि कुंती ने भीम से कहा कि मेरे लिए एक रात में एक मंदिर बनाओ। यदि एक ही रात में नहीं बनता है तो हम यह स्थान छोड़ देंगे। भीम के लाख प्रयास के बाद भी जब मंदिर पर छत लगाने का काम शुरू किया तब भौर हो चुकी थी ऐसे में भीम ने मंदिर को बनाना छोड़ दिया। वचनानुसार ‍पांडवों ने कुंतीसहित उक्त स्थान को छोड़ दिया।

शनिवार, 28 नवंबर 2009

gita ki booli: श्री श्री श्रीमद -भागवत -गीता

gita ki booli: श्री श्री श्रीमद -भागवत -गीता

ajb teri maya



jagrn ,अजूबा बना जिराफ, कर रहा योगवाशिंगटन, एजेंसी : सीधी और लंबी गर्दन जिराफ की खासियत है। अपनी लंबी गर्दन के कारण ही जिराफ का खाना-पीना हो पाता है। पर ओहियो के टुलसा चिडि़याघर में पल रहा एक जिराफ इन दिनों दर्शकों के कौतूहल का केंद्र बना हुआ है। एमली नाम की इस मादा जिराफ की गर्दन सीधी न होकर हुक की तरह मुड़ी हुई है। इसके बावजूद वह आराम से खाना खा लेती है। ऐसे में वह आम लोगों के लिए अजूबा बनी हुई है। चिडि़याघर के कर्मचारियों का कहना है कि गर्दन मुड़ी होने के बावजूद 11 फुट लंबी एमली सामान्य है। हालांकि डाक्टर उसकी गर्दन सीधी करने की कोशिश भी कर रहे हैं। यहां तक कि उसे योग का अभ्यास भी कराया जा रहा है। जिराफ की गर्दन की हड्डियां काफी मजबूत और सीधी होती हैं। इस कारण ये ऊंचे पेड़ों से अपना भोजन लेने में सक्षम होते हैं। लेकिन पांच साल की एमली के मामले में ऐसा नहीं है। इसलिए वह डाक्टरों के लिए भी शोध का विषय बनी हुई है। डाक्टर यह पता लगा रहे हैं कि एमली में इस विकृति का क्या कारण है। वे यह भी शोध कर रहे हैं कि विकृति के बावजूद एमली आम जिराफ की तरह ही कैसे खा-पी लेती है। एमली का उपचार कर रहे डा. बैकस ने कहा कि गर्दन में खिंचाव आने पर मनुष्य योग का सहारा लेते हैं। उसी तरह एमली की गर्दन सीधी करने के लिए योग का सहारा लिया जा रहा है। उसे दर्द निवारक दवाएं भी दी जा रही हैं। चिडि़याघर के निदेशक ने कहा कि एमली का अर्थ होता है होप यानी उम्मीद। हमें भी उसकी गर्दन ठीक हो जाने की उम्मीद है।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

भुत


प्रेत जिन पिशाच का सनातन धर्म से सम्बन्ध?
सनातन धर्म में भूतों का विशेष महत्व हे |गीता शास्त्र में भगवान क्ह्तेहे की बहुत प्रेत पिशाच जिन की हम बुरी या भली आत्मा के रूप में कल्पना करते हें ओर समाज में इन का
वर्चस्व भी देखा करते हें |वास्तव में वही आत्मा परमात्मा होती हे |परमात्मा का कहना हे की तुम मेरी ओर एक कदम चलो में तुम्हारी ओर चार कदम बडूगा |जब हम उस परमात्मा का चिन्तन खुदा यशु अकाल्पुर्ख या भूत प्रेत जिन पिशाच आदि के रूप में करते हैं तब परमात्मा उसी रूप में चार कदम हमारी ओर बड़ता हे , भगवान कृष्ण ने मिटटी खा कर माता के कहने पर अपना मुह खोल कर दिखाया तब माता को उन के मुह में बह्मांड नजर आया था |माता उन को पहिचान नही सकीं और उन पर किसी बला का साया समझ बैठीं |यदि यह उन को ब्रह्मांड का स्वामी मान लेतीं तो उन को तभी पता चल जाता की कृष्ण उन का पुत्र नही भगवान हेँ |इस के बाद श्री कृष्ण की लीलाएं किसी भूत प्रेत से कम नही थीं |हमारे शस्त्रों ने तो यहाँ तक कहा हे कि जेसा स्वरूप हम अपने मष्तिष्क में बनाते हेँ भगवान उसी रूप के हो जाते हैं |सागर का जल सागर नदी का जल नदी गिलास कटोरी का जल वैसा ही रूप धारण कर लेता हे भगवान भी जिस रूप में खोजे जाते है उसी रूप के होकर वैसे ही कर्म करने लगते हैं |अर्जुन भी भगवान का विराट रूप देख कर भयभीत हो उनसे शांत स्वरूप में दर्शन देने का आग्रह करते हैं |अतः प्रमाणित होता हे कि सदा शांत स्वरूप ही पूजने के योग्य होता हे |क्रोधित स्वरूपों की कल्पना मात्र क्रोध उत्पन कर उत्पात उत्पन करती हें |क्या यह खोज का वेज्ञानिक विषय नही हो सकता ?या ओझा तांत्रिकों का विषय अथवा दिमाग के डाक्टरों की कमाई का विषय मात्र इस लिए हो गया की सनातन धर्म को हम भूल गये हैं ?सनातन के मूल सिधान्तों का अनुसरण न करने से भूत प्रेत जिन के चक्र में दुखी होना स्वभाविक ही है |यदि हम देवता ही मान कर चलें तो भी देवता लोग किसी को नुक्सान नहीं पहुंचाते
    (सनातन धर्म बेशक पुराना है पर प्रयोग नया है )

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

सनातन की नरमाई चारों धर्मो में कमी लाइ

 हर इन्सान की रक्षक गीता ,
                                                     आज कल होड़ लगी हुई हे की किस का धर्म बडा हे कोनसा धर्म सचा हे मेरा तेरा या उसका ?
                    गीता शास्त्र ने तो साफ़-साफ़ कहा हे की यदि तुझे लगे कि दुसरे का धर्म तुझ से अछा हे तो भी अपने जन्म वाले धर्म को कभी भी ना त्यागना ,अपने स्वधर्म को ना त्यागना उसी स्वधर्म के कर्म को करता जा तू मोक्ष को प्राप्त हो जाए गा |
                              प्रभु कि इस आज्ञा के बाद छोटे-बडे का प्रश्न ही नही उठता ,फिरभी सनातन धर्म के चारों अंग हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई अपने-अपने धर्म को बडा चड़ा कर एक दुसरे का अपमान करने पर तुले हुए हैं |
                       हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई आपसमे भाई-भाई क्यों कि यह चारों ही सनातन धर्म के अंग हें |इन चारों धर्मों को निर्देश देने वाला एक वही सनातन पुरुष परमात्मा ही हे |ऐसा इस लिए भी कह सकते हें कि इन चारों धर्मों को उस परमात्मा ने एक जेसी ही आज्ञा दे रखी ही |जिसमे प्रमुख आगया तो यही हे कि मुझे अर्थात ईश्वर के अतिरिक्त और किसी को सताधारी मत माना |
सदा मुझमे ध्यान लगाना ,निदा चोरी -चकारी ,व्यभिचारी , अपराध(पाप कर्म)से बचना पडोसी से बना कर रखना ,ध्यान रखना तेरे आस-पास रहने वाला कोई भूखा ना रह जाए दुखिये कि यथा योग्य मदद करना
                        हाँ कभी कोई भेष ऐसा मत बनाना कि तेरी पहिचान हो कि तू अमुक समुदाय से हे एक दम सरल सादा भेष हो तेरा कोई विशेष भेष धारण करने कि कोई जरूरत नही |
             आज चारों धर्म चाहे हिन्दू हो या मुसलमान सिख हो या इसाई उस ईश्वर कि इन आज्ञाओं का पालन करने में हीच-किचाता हे |जो इन या ऐसी ही और प्रभु आज्ञाओं का पालन करताहे वही फकीर कहलाता है |फकीर इन चारों धर्मों में आज भी पाया जाता हे |
                       फकीर ही परमात्मा कि आँख का तारा होता है |बाकी मुझे तो कोई भी धर्म जिस का पतन ना हो रहा हो नजर नही आरहा |आइये अब लोट चलें अपने उसी पुराने सनातन धर्म कि ओर उसके बनाये नियमों कि ओर अभी भी वक्त हे सुबहा के भूले को भुला नही कहते |
सनातन पुरुष का गुण-गान हो अपने अपने धर्मानुसार परमात्मा की पूजा हो घंटी घडियाल बजाने नमाज पड़ने गुरबानी पड़ने ओर प्रार्थनाओं का असर तभी दिखाई देगा जब सनातन धर्म में रहते हुए सनातन नियमों का पालन होगा
\             नही तो विचार करलो चारों धर्मों ने विश्व शान्ति के लिए पाठ पूजा की परन्तु हर प्रयास असफल रहा |सनातन वृक्ष की जड़ को सींचने की जरूरत हे आज सनातन वृक्ष पुन्हा हरा-भरा हो जाए गा |प्रयास तो कर के देखो |

उधेड़-बुन: करवा चौथ


अंधे की आँख गीता ,
                बदलते जमाने ने बदल दिए
                             दिन त्यौहार
                  विरोध करने वाला खाता मार

करवा चोथ का व्रत

मनकी शान्ति गीता ,
                                   करवा चोथ की सभी को बिधाई बहुत ही कठिन व्रत होता हे अन जल कुछ भी ना ग्रहण कर सुहागिने पीटीआई की लम्बी आयु की कामना करतीं हैं |बेचारे पति देव का हाल तो देखो पत्नी पानी तक नही पीती पर व्रत के नाम पर पति देव के हजारों खर्च हो जाते हें |
                             एक पत्नी ने करवा चोथ का व्रत रखा रातको व्रत खोलना था पति से पत्नी ने कहा  रातको खाने के लिए कुछ मिठाइयां और केले लेते आना पत्नी व्रता बाजार से सारा सामान ले आया रात को चाँद निकला ,व्रत तोड़ने की तयारी हुई |पत्नी ने डट कर सारे दिन की भूख मिटाई |
         थोडी देर के बाद पत्नी के पेट  में जोरों की दर्द होनी शुरू हो गयी पति परेशान सारे घरेलू उपचार कर लिए दर्द नही रुका पति पडोसी के घर से पेट दर्द की टिकिया ले आया |पानी गर्म कर पत्नी से बोला लो यह टिकिया खालो पेट दर्द रुक जावे गा |
           पत्नी ने पति को डांट लगाते हुए कहा अगर पेट में टिकिया की जगहा बची होती तो क्या में एक केला और ना खा लेती
                               

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

aaj se

orkut pr aaj se yh blog dekh skte hen