इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

झूठ की सच से दोस्ती

झूठ और सच दोनों लगे खाने ,एक ही थाली में । वक्त का चक्का लडखडा गया इन दोनों की प्याली में । समय -असमय भी इकठे हो लिए । सत्य-असत्य की राह में । । ज्ञान यह सब देख घबरा गया । बदल सा गया ख़ुद अपने आपमें । कितने दोष लगे आने नजर अपने ही यारों में । अपने आप में झांक कर तो देखो माजरा ख़ुद समझ में आजे गा क्यों दिल बंट गया घरवाली और बाहरवाली में । स्वार्थ पने को त्यागने में आप भी अपना -अपना हिसा डालदो,मानव समाज के हित में । तुम पर दुनिया नाज करे गी अगर भरते हो तुम यह शक्ति अपने माली में ............................................................................................................................. ॥ । ............................अज्ञानता ....................................................................................... ॥ --------------------------------------------------------------------------------------------- अज्ञानता के सागर में लगा गोता धर्म गुरु जेहाद हे बोलता ... ॥ । .जिसे वो जेहाद बताता हे उस में दहशत गर्दी नंगा नाच -नाचती हे ॥ ॥ सारा जमाना यह जान चुका हे पुरी तरह पहिचान चुका हे ॥ ॥ । फिर क्यों ख़ुद को धोखा दे रहे हो हजारों सबूतों को क्यों ठुकरा रहे हो ॥ ॥ क्या तुम कहीं शेतान बन दुनिया को ख़ुद में खुदा तो नही बता रहे हो ?॥ ॥ क्या तुम कहीं भूल तो नही गये की इंसानों का एक ही खुदा होता हे ॥ ॥ जिस का महबूब तुम्हारे जेहाद से मरने वाला भी होता हे

रविवार, 26 जुलाई 2009

ज्ञान गुरु का ज्ञान भन्डार: भगवद्‌गीता

ज्ञान गुरु का ज्ञान भन्डार: भगवद्‌गीता

मनकी शान्ति गीता ,मन की चंचलता गीता ,मन की हलचल गीता ,मन को काबू करती गीता ,मनकी तृप्ति गीता ,सभी की मार्गदर्शक गीता ,तेरी मेरी गीता ,अंधे की आँख गीता ,बुडे -बचे -जवान का सहारा गीता , हर इन्सान की रक्षक गीता ,चिन्तन -मनन का साधन गीता

युद्घ की तयारी या ज्ञान की बरी ?

श्री भगवानुवाच ---------हे अर्जुन तुझे बिना समय -असमय की पहिचान किए यह मोह क्यों हो गया हे की मेरे गुरु -मेरे नाती मेरे मित्र मेरे रिश्ते दारयहाँ विचार ने की बात यही हे की अर्जुन को ऐसे समय समय ऐसी उट पटांग बातो का ज्ञान हो जाता हे जिन का ज्ञान उसे बहुतहीपहले हो जाना चाहिए था इतना ही नही की उसे पता नही था की ईश्वर से प्राप्त सभी विषय विकारों को त्यागा नही जा सकता वह तो जनता था परन्तु यह सभी बातें उसे ऐसे समय में याद आतीं हें जब वो युद्घ के मैदान में आ चुका होता हे युद्घ के मैदान में आकर इन बातो का विकार करना उचित ही नही अनुचित ही हे भगवान यही कह रहे हें की न तो यह श्रेष्ठ लोगों द्वारा प्रयोग होना चाहिए और अगर वह ऐसे समय इसे अपना कर्तव्य मन लें तो इस कर्तव्य का फल अपयश ही होगा न कोई सुख ही हो गा जेसे राजाबदती महंगाई के समय यह तो सोचे की मेरी प्रजा को कम कीमत पर वस्तुएं प्राप्त हों और वह उस के चूल्हे-चोके की वस्तुओं के दामों को कम न करके हॉउस-लोन की व्याज दरों को कम करने लगे या टी.वी-फ्रिजों के दाम कम करने लगे आज अर्जुन की भी वही हालत हे युद्घ के क्षेत्र में वो रिश्ते नाते देख रहा हे ऐसे समय भगवान ने कहा की अर्जुन तू नपुंसक मत बन समय को पड़ते हुए युद्घ के लिए खडा हो जा (दुसरे अध्याये के प्रथम तीनश्लोक)

शनिवार, 18 जुलाई 2009

जरा विचार तो कर लें

मनकी शान्ति गीता ,से तभी प्राप्त हो पानी सम्भव हे यदि अत्यंत श्रद्धालु हो इस को सुने पूजा दो प्रकार की कही गयी हे (१) बाह्य-------------बाह्य पूजा के भी दो हिसे बताये गये हें ()वेदकी ()तांत्रिक इस के आगे वेदकी पूजा भी दो प्रकार की बताते हें मूर्ति भेद से वेद मन्त्रों से "वेदकी"तथा "मन्त्रों " से जो पूजा होती हे उसे "तांत्रीक "पूजा कहते हें ॐ अकछर से शुरू होने वाले सभी वाक्य मन्त्र कहें जाते हें पूजा के रहस्य को न समझ क्र जो अज्ञानी मानव उल्टे ढंग से पूजन में संलग्न होते हें <वह अपना और दूसरो का पतन ही करते हें>सर्व श्रेष्ठ परम प्रेरक पूजा इष्ट के रूप को नमन ध्यान और स्मरण करना चाहिए पूजा का यही एक मात्र रूप बताया गया हे तुम चित को शांत कर दम्भ अहंकार का त्याग कर उस परमात्मा के रूप की शरण जाओ चित द्वारा वही रूप दिख ता रहे जप ध्यान की कड़ी कभी न टूटे अनन्य प्रेम पूर्ण भगती से प्रभु के उपासक बन यज्ञों द्वारा तप दान द्वारा प्रभु को संतुष्ट करने का बारमबार प्रयास करते रहने का अभ्यास करते रहोप्रभु की प्रतिज्ञा हे की जो सदा मुझ पर निर्भर रहते हें और जिनका चित निरंतर मुझ में लगा रहता हे वे उतम भगत मने जाते हें में तुरंत उनको इस भव सागर से तार देता हूँफिर चंदा उगाह कर कोंन सी पूजा आज कल हो रही हे इश्वर ही जाने इसी तरह के बडे -बडे यग्य विश्व शान्ति के नाम पर किए जाते हें और नतीजा आशा के विपरीत ही आता हे क्यों जरा विचार तो करें ?

क्या झूठ क्या सच?

दुनिया जल्द ही समाप्ति को प्राप्त होने वाली हे ऐसी खबरें टी.वी .पर विज्ञानिकों और माया कलेंडर द्वारा समय समय पर कही जाती हें आइये देखें हमारे देवी पुराण में क्या लिखा हे ?कलयुग में सरस्वती;गंगा;विश्वपावनी (तुलसी)पॉँच हजार वर्षों तक रह कर बैकुंठ को चलीं जाएँ गी तीर्थों में काशी वृन्द्रावन के अतिरिक्त सभी तीर्थ श्री हरी की आज्ञा से उन देवियों सहित बैकुंठ चले जायें गे शालिग्राम;शिव ;शक्ति ;और भगवान प्रशोतम कली के दस हजार वर्ष पुरे होने पर भारत को छोड़ कर अपने स्थान को पधारें गे इसके साथ ही साधू ;पुराण ;शंख ;श्राध;तर्पण और वेदोक्त कर्म भी भारत से उठ जायें गे देव पूजा ;देव नाम; धर्म ग्राम देवता व्रत -तप-और उपवास भारत से लुप्त हो जायें गे ठीक ऐसा ही हो रहा हे गंगा का बहावथम गया काशी बिंद्राबन बन के अतिरिक्त प्रायः अमरनाथ -वेष्णोदेवी -गुरु द्वारे-चर्च -मस्जिद -मका आदि स्थानों पर ऐसी -ऐसीं अप्रिय घटनाएँ घटतीं हें जो इसी और इशारा करतीं हें मांस मदिरा के सेवन से भी लोग नही बच सकते क्यों की मिलावट का जमाना जो हे ;झूठ-कपट से किसी को डर नही ;परस्पर मेत्री का अभाव जननी -मर्द कही भेद बचा हे जाती भेद भी समाप्त हो चुका हे ;दुराचार प्रत्येक परिवार में हो गा पत्नियाँ -पतिको प्रताडित करें गी जितना नोकर नीच हो गा -मालिक उससे भी ज्यादा कमीना होगा जिस की लाठी उसी की भेंस वाली कहावत होगी पुरूष अपने ही परिवार वालों से बेगानों जेसा व्यवहार करने लगे गा चरों वर्ण अपने आचार-विचार छोड़ दें गे संध्या-वन्दना -संस्कार लुप्त हो जायें गे राजा लोगों का तेज अस्तित्व ही समाप्त हो जाए गा लाखों में एक भी पुण्यवान नही होगा ग्राम नगर जंगल के समान प्रतीत हों गे (जो अब २०२०से पूर्व ही होने को हे)भलीभांति जोते गये खेत में खेती नही होगी नीच वर्ण वाले धनी होने से श्रेष्ट मने जायें गे कलयुग में भगवान का नाम बेचा जाए गा (गुरु लोग यही कर रहे हें )मनुष्य अपनी कीर्ति बडाने को दान कर के वापिस लेलेगें -आदमी ओरत आपस में अवेध सम्बन्ध बनावेंगे अधिक क्या कहें चरों और मलेछ ही मलेछ हो जायें गे तब विष्णु यश नामक ब्रह्मिण के घर प्रभु अवतार लें गे और तिन रातों में ही धरती को मलेछ शून्य करदें गे इस के बाद फर अराजकता फेले गी लुट पाट होगी तब ६ दिन की मुसला धार वर्षा से ही धरती प्राणी -वृक्ष-ग्रह से शून्य हो जावे गी .अभी समय हे मनुष्य को भगवान की शरण के अतिरिक्त और कुछ भी धारण न करते हुए ख़ुद को बचाने का प्रयास करना चाहिए

शनिवार, 11 जुलाई 2009

जीवन में गीता (शिव - गीता)

श्री कृष्ण की भांति शिव गीता भी मनुष्य को आद्यात्मिक ज्ञान प्रदान करती हे गीता का मुख्य प्रयोजन मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सुझाना हे मोक्ष ज्ञान से प्राप्त होता हे .ज्ञान हर प्राणी में हो ता हे जिस को गीता का ज्ञान प्रकाशत कर देता हे तत्व का ज्ञान गीता से ही जानने को मिलता हे श्रुति वाक्यों के अर्थों को जानना श्रवण और वेदन्त के अनुकूल युक्ति श्रवण चिन्तनका नाम मनन हे जो पुरूष में वेराग उत्पन करे उसी का नाम गीता कहा जा सकता हे
\ (शिव गीता प्रथम अध्याये )
सूत जी बोले शोंकदिकोइसके उपरांत में आपको शुद्ध केवल्य मुक्ति दायक संसार के दुःख छुडानेमें ओषधि रूप शिव गीता को शिवजी के अनुग्रह से वर्णन करता हून कर्मों के अनुष्ठान न दान न तप से मनुष्य मुक्ति को पता हे जब की मुक्ति ज्ञान से ही प्राप्त होती हे शिवजी ने दंड कवन में रामजी को सिव गीता का उपदेश दिया यह गुप्त से भी गुप्त हे इसके श्रवण मात्र से ही मनुष्य मुक्ति को प्राप्त हो जाता हे जिसे स्कन्द जी ने सनत्कुमार से कहा श्रेठ मुनि सनत्कुमार जी ने आगे ब्यास्जी को और व्यासजी ने हम सब पर कृपा करते हुए कहा और यह भी कहा था की तुम यह गीता किसी को मतदेना हे सूत पुत्र ऐसे वचनों का पालन न करने से देव क्रोधित हो शापित कर देते हें हे ब्रह्मिनो ,तब भगवान व्यास जी से पूछा सब देवता क्षोभित हो श्राफ क्यों देते हे उन का इस से क्या नुकसान होता हे अब व्यास जी ने बहुत ही सुंदर उतर दिया जो आज तक समझने में नही आया जो ब्रह्मिणनटी अग्नहोत्र करते और ग्रहस्थ में रहते हे वह सभी ग्रहस्थी देवताओं के लिए कामधेनु के समान हें खाने-पीने योग्य पदार्थों का जो दान पुन्य विधि विधान द्वारा किया जाता हे वह सब कुछ स्वर्ग में देवताओं को प्राप्त होता हे जिस से देवता ईष्ट कोप्रसन्न किया करते हें अर्थात स्वर्ग में देवताओं के पास ऐसा कुछ भी नही होता जिससे वह कोई कार्य प्रसन्नता पूर्वक करलें हम ग्रहस्थी देवताओं के लिए जो कुछ देते हें वो उन ko स्वर्ग me प्राप्त होता हे जब मनुष्य कोई दान-पुन्य नही करता तब उन ko कुछ भी प्राप्त नही होता ऐसा ग्रहस्थी ठीक वेसा hi होता हे जेसे किसी ग्र्ह्थी की गाये बहर चरने को जावे और कोई us को दोह ले घर खाली ही आजाये तब जो दुःख उस ग्रहस्थी को होता हे वेसा ही दुःख देवताओं ko भी होता हे इस प्रकार देवताओं को ज्ञान-वान ब्रह्मिण सदा दुःख ही देता हे तब देवता इसी विषय से उस ki पत्नी पुत्रादि में प्रवेश कर विघ्न पैदा करते हें देहधारी को चोकी लग जाती हे यदि नारी ko चोकी लगे तो कई निगाहें उसे घूरतीं हे मुर्ख प्राणी खुस हो ता हे की हमारे घर चोकी लगती हे वहतो भूल जाता he की यह कोई वरदान नही शाप he ---क्या किसी नारी को समूह का समूह घूरे कोईठीक बात हे ?ऐसों के साथ अच्छे बर्ताव का कोई नियम hi नही बनता खेर ऐसे मूर्खों को शिव का प्रसाद नसीब नही होता
रावण इस बात को जनता था की यदि स्वर्ग को जितना हे तो पहले स्वर्ग के लोगों को कमजोर करना होगा उस ने ऐसा किया जो-जो हवन -दान -पुन्य करते थे उनको मार -मार कर स्वर्गको पहुंचने वाली रसद को रोका फिर कमजोर देवतों को बंधी बना लिया नाभि में अमृत के रहते भी शिव का परशाद नही मिला अलग बात हुई की रावण भगवान राम की दृष्टि में भाई व्भिष्ण के वचनों द्वारा मर कर मोक्ष को प्राप्त हुआ हम लोगों पर यदि देवता नराज हो जाएँ तो मनुष्य मोक्ष केसे प्राप्त कर सकता हे अन्यथा नही इसी गीता में देवताओं के कोप से बचने का उपाए भी कहा गया हे -----------करोडों जन्मो के पुन्य संचय हो ने से भगवान में भगती प्त्प्न होती हे उस भगती से स्वार्थ की पूर्ति की कामना छोड़ कर जो मनुष्य भगवान में अर्पित भुधि से यथा विधि पूर्वक कर्म करता हे तब उन भगवान की कृपा से भगती में रत प्राणी कोंउक्सन पहुचाने वाले देवता भयभीत हो भाग जाते हें भगती करने से भगवान का चरित्र सुनने की अभिलाषा पैदा होती हे इसे सुनने से ज्ञान और ज्ञान से मुक्तिहो जाती हे ऐसे प्राणी को करोडों पापों से मुक्ति मिल जाती हे (पूजा पाठ ब्रह्मिण का धर्म हे तो भगती करने का अधिकारी हर जाती का प्राणी होता हे )























\